Saturday, April 19, 2025

दोस्ती की जान


जादूगर की जान तोते में थी

रावण की जान उसकी नाभि में

ऋन्याकश्यप की जान आकाश और धरती के बीच

मगर दोस्ती की जान कहाँ छुपी होती है


कुछ दोस्तियाँ सदाबहार होती हैं

ना मिलने जुलने पर भी बरक़रार रहती हैं

कुछ को मगर निभाना पड़ता है

समय समय पर सजाना पड़ता है


कुछ जीती हैं सालों साल

रेगिस्तान में उगी झाड़िओं जैसी

कुछ माँगती भी नहीं 

और फल देती हैं चटख और मीठा


कुछ दोस्तियाँ महंगी होती हैं

घूमना फिरना, गप शप

करते रहो तो बनी रहेंगी, 

वरना हो जायेंगी तितर बितर 


कुछ होती हैं लचकदार टहनी के जैसी

कितना भी लटको, कूदो, बनी रहती हैं

और कुछ जैसे काँच की बनी हों

छोटा सा नज़रअंदाज़ी का कंकड़ लगा नहीं के दरार आ गई


और हम तो वही हैं, पर दोस्तियाँ इतनी अलग अलग क्यों

जादूगर की जान तोते में

रावण की जान उसकी नाभि में

और दोस्ती की जान? कहाँ छुपी होती है आख़िर


स्त्री और पुरुष की दोस्तियाँ अलग हैं

स्त्रियों की दोस्ती आपसी समझ और साझेदारी से पनपती हैं

पुरुषों की कोई उन्हें कोई माने, सम्मान दे 

और मजबूरी में साथ निभाये


कुछ दोस्तियाँ जमने में सालों साल लगते हैं

जैसे अद्भुभुद बर्फीला पहाड़..पड़ती रहे बर्फ महीनों सालों 

तब जाकर रूप लेता है

और कुछ, मिनटों में, सूरज की तरह उग जाती हैं


सभी दोस्तियों के टूटने बनने का सबब अलग होता है

जादूगर की जान तोते में

रावण की जान उसकी नाभि में

और दोस्ती की जान? आख़िर कहाँ छुपी होती है


शायद हम औरों में अपना प्रतिबिंब ढूँढते हैं

चेहरा भले अलग हो लेकिन दिल, हमारी ही तरह हो

साफ़ सुथरा या मैला कुचेला 

हमें कोई और नहीं चाहिए होता… बस हम ही हों, दूसरे प्याले में भी…जिसकी चुस्की लेते रहें

बस एक ही स्वाद चढ़ा है जीभ पर


जादूगर की जान तोते में

रावण की जान उसकी नाभि में

और दोस्ती की जान 

उस रिश्ते में, जो हमारा अपने आप से है


वो रिश्ता अगर कमजोर है

तो थोथली दोस्तियाँ, लड़ना झगड़ना, दोस्तियों का बनते बिगड़ते रहना 

और मजबूत, तो दोस्तियाँ भी स्थिर, जो नहीं टूटती

बस बढ़ती संवरती रहती हैं , सालों साल 


जादूगर की जान…



चिड़िया की मुस्कुराहट

 

पेड़ की टहनी पर एक चिड़िया चहचहा रही थी 

या अपनी भाषा में शायद गाना गा रही थी


या कहो अपने तरिके से

मुस्कुरा रही थी


पास से गुजरा मैं तो सकपका के उड़ गई

ढूँढता रहा मैं के जाने कहाँ गई


घोंसला रहा होगा यहीं कहीं आस पास

जिसमें दो चार चूज़ों का शायद होगा निवास


डर गई होगी मेरी बेढंगी सी चाल से

छुपाने गई होगी बच्चों को खतरे की आँच से


या हो सकता है के खाना बटोरने गई हो

गाने में किसी स्वादिष्ट कीड़े का ज़िक्र आ गया हो


बस इतना ही तो होता है चिड़िया का जीवन

थोड़ा गा कर, या खा कर, या बच्चों को खिला कर…

जिसका करती है यापन


सोचने लगा के मुझ पर भी कौन से हैं बड़े काम

में भी यही कर लूँ  इन्हीं में है आराम 


थोड़ा गा कर, खा कर, खिलाकर

और मुस्कुरा कर

में भी करूँ विश्राम


क्यूंकि मुझे तो प्रभु ने दिया है एक और सम्मान

चेहरे को दिया है मुस्कुराने का सामान