Monday, May 16, 2022

मुलाक़ात


फिर एक बार मुझ से मिल

पहले की तरह

मासूमियत सेमुहब्बत से

फिर एक बार मुझ से मिल


तेरी वो बेबाक हंसी

जिसमें तेरी खुशियां तोल्ती थी मैं

नजरों में चमकते सितारे

जिनमें खुद को ढूंढ लिया करती थी मैं


उनकी भूख अब भी बाकी है मुझे

फिर एक बार मुझ से मिल


तेरे कदमाैं के तूफान में

खुद को लपेटा करती थी

तेरे हाैसले के शोलों में

खुद भी दहका करती थी


शायद तुझे तेरी याद दिला दूंगी मैं

झुकी हुई कमर में 

फाैलाद बहा  दूंगी मैं

मेरे लिये ना हो अपने लिये सही


फिर एक बार मुझ से मिल


रूह हूं तेरी कोई गैर नहीं

फिर एक बार मुझ से मिल


जाल



दौलतों आौर शौहरतों के ख्वाब मैं चुनता गया

उनको पकड् लूं बांध लूं ये जाल मैं बुनता गया


दो चार दिल टूटे मगरपरिवार जन छूटे मगर

नये मंजरों की चाह मैंमैं  बेधड्क बढ्ता गया


कुछ ख्वाहिशें पूरी हईकुछ मंजिलें हासिल हुई

नये मंजरों की चाह मैंमैं बेसबर बढ्ता गया


थी सनहरी शाम वोआलम बड़ा रंगीन था

थे बंघे खूंटे से सबजिन ख्वाबों का पीछा किया


दौलत इस किनारे कूदतीशौहरत वहॉ अकड़ी खड़ी

मन मुध्घ था इस बात सेजो ख्वाब था पूरा हुआ


सोचा के अब आजा्द हूं जो चाहा था वो पा लिया

आराम के दो चार पल भोग लूं मै भी जरा


छटपटाया था मगर निकल ना पाया किस तरह

जिस जाल मे फांसा था उनकोउस जाल में था खुद फंसा


सोने के ताबूत में जब आखरी सफर तय किया 

लोगों ने हंस कर कहा जिस में जिया उस में मरा  


खतायें


कह देना ख़ताओं से 

हमें अब भी सताती हैं

जो हम ने कींजो तुम से हुईं

वो अब भी याद आतीं हैं


कभी तारीखें भूल जाना

कभी घर देर से आना 

कभी चुप देर तक रहना 

कभी बेबाक़ बोल जाना


कह देना ख़ताओं से 

हमें अब भी सताती हैं

जो तुम ने कींजो हम से हुईं

वो जब भी याद आतीं


इन ग़ुस्ताख़ नज़रों का 

महफ़िल में भटक जाना

उन मधहोश लबों का

किसी को देख मुस्काना


कभी क़समें तोड़ देना

कभी वादे ना निभाना

कभी रूठे हुए रहना

कभी तुमको ना मानना


कह देना ख़ताओं से 

हमें अब भी सताती हैं

जो तुम ने कींजो हम से हुईं

वो जब भी याद आतीं


कह देना अदाओं से 

हमें अब भी सताती हैं

जो तुम से लिपटी रहती थीं 

वो जब भी याद आतीं


नज़रों का यूँ ही कभी

मिलके झुक जाना

ज़ुल्फ़ों से खेलते खेलते

बेबस ही मुस्काना


राह चलते कभी

फूलों को देख रुक जाना

हर शाम मिलने पर 

लपक कर गले लगाना


कह देना अदाओं से 

हमें अब भी सताती हैं

जो तुम से लिपटी रहती थीं 

वो जब भी याद आतीं


कभी मासूम सी बकबक

कभी ख़ामोशी में भी बातें

कभी खोई खोई सी नज़रें

कभी बेसब्र सी आहें


कह देना अदाओं से 

हमें अब भी सताती हैं

जो तुम से लिपटी रहती थीं 

वो जब भी याद आतीं


आख़िर खता यूँ हम से हुई

एक ज़ालिम की इबादत कर बैठे

ज़ख़्म देने की आदतों को 

उनकी अदा समझ बैठे


साँकल


अतीत सुनहरी साँकल एक

पहचानी सी जो लगती है

जाने कितनों को अक्सर जो

कारावास में रखती है


याद करो जब फिसले थे

चौखन्नी खा कर गिरे थे जब

अक्सर याद दिलाती है 

दस्तक यही लगाती है


जो हो  सकाजो कर ना सके

ये झन झन राग बजती है

मत करो उपेक्षा स्वयं से अब

नित दिन ये समझाती है


जिस लायक़ होबस वही मिला

कुछ और नहीं अब बदलेगा

जो है उस से ही सब्र करो

बस मंत्र यही दोहराती है


अतीत सुनहरी साँकल एक

पहचानी सी जो लगती है

जाने कितनों को अक्सर जो

कारावास में रखती है


अतीत की साँकल तोड़ो अब

उँगली भविष्य की भी छोड़ो अब

वर्तमान में डुबकी लेकर

धारा समय की मोड़ो अब


क्या फ़र्क़ कहाँ से आयी हैं

क्यूकर कहाँ उन्हें जाना है

वर्तमान की लहरों को तो

बस अपना गीत ही गाना है


क्या हुआ कभी और क्या भ्रम था

क्या होगा आगे जाने कौन भला

सुखी वही है जो मानस

आज में रहकर श्रम करता


एक बुलबुला वर्तमान का

ये सारा दृश्य दिखलाता है

क्यूँ क़ैद हो साँकल के पीछे

जहां अंधकार की माया है


क़ुसूर



जब यूँ ही अकेला होता हूँ 

दिल करता ये क़ुसूर है

झोंका तेरी यादों का

लाता तो ज़रूर है


लहरों की नटखट चंचलता 

तेरी हंसीयों में छनती थी

उगते सूरज की लाली भी

तेरे गालों पर सजती थी


तेरी आँखों की मदिरा

मेरे दिल पल छलकी है

ख़ुशबू तेरे काँधे की

मेरे तन से लिपटी है


पी कर यादों की प्याली को

छाया यूँ सरूर है

कहने को ये बात तुझे

अब होता दिल मजबूर है


तेरे हाथों में हाथ रहे

दो चार क़दम हम साथ चलें

कुछ लम्हे तेरे साथ कटें

बस दिल का ये फ़ितूर है