नीद चुराने से पहले जिन्हें खुद नीद न आए
ऐसे सितमग़र को हम बेगुनाह समझ बैठे
पलकों के पीछे जो बुनते थे रेशमी जाल
उन झुकी हुई नज़रों को हम शर्मसार समझ बैठे
जिस पल्लू का फिसलना थी एक नापी तुली अदा
उसको हम महज़ इत्तेफाक समझ बैठे
किताब गिराने का हुनर जिन्हैं बचपन से मिला हो
उसे हम खुद की महतबानी समझ बैठे
बिना बोले जो तीनो लोक घुमा दे
उनकी खामोशी में हम उन्हें बेज़ुबान समझ बैठे
हर आंसू की क़ीमत का जो एहसास दिला सके
उनके आंसुओं को हम लचार समझ बैठे
दिल देने के बदले में जो लेते हैं जान
ऐसे सौदागर से हूँ व्यापार कर बैठे
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