Monday, May 16, 2022

समुंदर


 समुंदर ये बता

तू तड़पता बेचैन क्यूँ

कौन सी दिल की कसक

ने चुराया चैन यूँ 


छटपटाटी सीने पे लहरें

बांचती हैं क्या कथा

अंतर में तेरे जल रही 

है आग कैसी ये बता


गहराइयों में तेरी पनपते

डूबते सपने हज़ार

कौनसे उन में हैं ऐसे  

जिनकी सुनता तू पुकार


चाँद को बाहों में लेने की 

ज़िद है कैसी ये भला 

क्यूँ उमड़ता ज्वार दिल में 

जब आकाश से वो झांकता 


ऊँचायीयाँ छूने को जिसकी

बेसब्री से तू झपट रहा 

देख क्षितिज पर झुक रहा 

तेरे पैरों में वो आसमान


छू भी लिया आसमान को एक दिन

पाएगा तू क्या भला

लाखों परिंदे खेलते हैं

बाहों में उसकी सदा 


गहराइयों पर अपनी नज़र कर

पाएगा संतोष तब

खेलते हैं अंतर में तेरे 

अंतरिक्ष और पाताल सब


तू है पुरातननूतन है तू

इस धरा का आभूषण है तू

सम्भव नहीं तेरे बिना

पल भर को भी जीवन यहाँ

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