ए समुंदर ये बता
तू तड़पता बेचैन क्यूँ
कौन सी दिल की कसक
ने चुराया चैन यूँ
छटपटाटी सीने पे लहरें
बांचती हैं क्या कथा
अंतर में तेरे जल रही
है आग कैसी ये बता
गहराइयों में तेरी पनपते
डूबते सपने हज़ार
कौनसे उन में हैं ऐसे
जिनकी सुनता तू पुकार
चाँद को बाहों में लेने की
ज़िद है कैसी ये भला
क्यूँ उमड़ता ज्वार दिल में
जब आकाश से वो झांकता
ऊँचायीयाँ छूने को जिसकी
बेसब्री से तू झपट रहा
देख क्षितिज पर झुक रहा
तेरे पैरों में वो आसमान
छू भी लिया आसमान को एक दिन
पाएगा तू क्या भला
लाखों परिंदे खेलते हैं
बाहों में उसकी सदा
गहराइयों पर अपनी नज़र कर
पाएगा संतोष तब
खेलते हैं अंतर में तेरे
अंतरिक्ष और पाताल सब
तू है पुरातन, नूतन है तू
इस धरा का आभूषण है तू
सम्भव नहीं तेरे बिना
पल भर को भी जीवन यहाँ
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