दौलतों आौर शौहरतों के ख्वाब मैं चुनता गया
उनको पकड् लूं बांध लूं ये जाल मैं बुनता गया
दो चार दिल टूटे मगर, परिवार जन छूटे मगर
नये मंजरों की चाह मैं, मैं बेधड्क बढ्ता गया
कुछ ख्वाहिशें पूरी हई, कुछ मंजिलें हासिल हुई
नये मंजरों की चाह मैं, मैं बेसबर बढ्ता गया
थी सनहरी शाम वो, आलम बड़ा रंगीन था
थे बंघे खूंटे से सब, जिन ख्वाबों का पीछा किया
दौलत इस किनारे कूदती, शौहरत वहॉ अकड़ी खड़ी
मन मुध्घ था इस बात से, जो ख्वाब था पूरा हुआ
सोचा के अब आजा्द हूं जो चाहा था वो पा लिया
आराम के दो चार पल भोग लूं मै भी जरा
छटपटाया था मगर निकल ना पाया किस तरह
जिस जाल मे फांसा था उनको, उस जाल में था खुद फंसा
सोने के ताबूत में जब आखरी सफर तय किया
लोगों ने हंस कर कहा जिस में जिया उस में मरा
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