Monday, May 16, 2022

जाल



दौलतों आौर शौहरतों के ख्वाब मैं चुनता गया

उनको पकड् लूं बांध लूं ये जाल मैं बुनता गया


दो चार दिल टूटे मगरपरिवार जन छूटे मगर

नये मंजरों की चाह मैंमैं  बेधड्क बढ्ता गया


कुछ ख्वाहिशें पूरी हईकुछ मंजिलें हासिल हुई

नये मंजरों की चाह मैंमैं बेसबर बढ्ता गया


थी सनहरी शाम वोआलम बड़ा रंगीन था

थे बंघे खूंटे से सबजिन ख्वाबों का पीछा किया


दौलत इस किनारे कूदतीशौहरत वहॉ अकड़ी खड़ी

मन मुध्घ था इस बात सेजो ख्वाब था पूरा हुआ


सोचा के अब आजा्द हूं जो चाहा था वो पा लिया

आराम के दो चार पल भोग लूं मै भी जरा


छटपटाया था मगर निकल ना पाया किस तरह

जिस जाल मे फांसा था उनकोउस जाल में था खुद फंसा


सोने के ताबूत में जब आखरी सफर तय किया 

लोगों ने हंस कर कहा जिस में जिया उस में मरा  


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