है बड़ा कम्बख़्त ये
बहकता बेवक्त ये
धड़कनों की ताल पर
थिरकता हर वक़्त ये
वासनाओं का नीड ये
बेताबियों की भीड़ ये
तीर ये छिटका हुआ
राहगीर भटका हुआ
चाहतों हैं बेपनाह
डूँढता अगला गुनाह
ख्वाहिशों की देग है
भरा हुआ ये मेघ है
सृष्टि के जलते हवन
में फूँकी हुई ये आग है
अनंत तक सुलगती रहें
सामिग्री इच्छायें हैं
चतुर भी है चट भी
रचता है प्रपंच भी
कम्बख़्त की क्या पूछिये
तुम्हारा हमारा दिल है ये