पेड़ की टहनी पर एक चिड़िया चहचहा रही थी
या अपनी भाषा में शायद गाना गा रही थी
या कहो अपने तरिके से
मुस्कुरा रही थी
पास से गुजरा मैं तो सकपका के उड़ गई
ढूँढता रहा मैं के जाने कहाँ गई
घोंसला रहा होगा यहीं कहीं आस पास
जिसमें दो चार चूज़ों का शायद होगा निवास
डर गई होगी मेरी बेढंगी सी चाल से
छुपाने गई होगी बच्चों को खतरे की आँच से
या हो सकता है के खाना बटोरने गई हो
गाने में किसी स्वादिष्ट कीड़े का ज़िक्र आ गया हो
बस इतना ही तो होता है चिड़िया का जीवन
थोड़ा गा कर, या खा कर, या बच्चों को खिला कर…
जिसका करती है यापन
सोचने लगा के मुझ पर भी कौन से हैं बड़े काम
में भी यही कर लूँ इन्हीं में है आराम
थोड़ा गा कर, खा कर, खिलाकर
और मुस्कुरा कर, मैं भी करूँ विश्राम
क्यूंकि मुझे तो प्रभु ने दिया है एक और सम्मान
चेहरे को दिया है मुस्कुराने का सामान
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