Sunday, November 3, 2013

तन्हाई

तन्हाई

जिस तन्हाई से तुम लड़ते हो
उसका नाता हम से भी है;
जो अकेलापन तुम्हे हराता है
वो हुम्हारे साथ भी साए की तरह फिरता है

जिन मजबूरीओं ने तुम्हारे हाथों को बाँधा है
वो हुमारी बेड़ियों से कुछ अलग नहीं है
जिस आह में तुम्हारी खुशियाँ डूबी थी
उसकी गहराइयों को हम भी टटोलते हैं

जिस मायूसी के समंदर में तुम्हारे सपने डूबे थे
वहाँ हम्नए भी कई ख्वाब दफ़न किए हैं
जिस ज़िंदगी की मूरत से तुम जवाब माँगते हो
उसके कदमो में हमारे सूखे आँसुयों के भी कुछ दाग हैं शायद

जाने अंजाने कोई खुशी  जब तितली की तरह पंख मार कर सामने आती है
तो उससे पकड़ कर बस रख लेने को जी चाहता है
लेकिन खुशी  का दम, तितली की तरह, बहुत नाज़ुक होता है शायद
और गम तो पुराने अख़बार की तरह..बोरी में भरते चलो बस

शायद इसी लिए तुम्हे पुकारा  था हमने
लगा था जैसे तुमसे पहचान पुरानी है
फिर उस तितली की तरह, जिसके पंखों को च्छुने से दर गये थे हम

इस एहसास को भी हमने जाने दियातुमको जाने दिया

एक रात की बात

उस रात हवा का आलम कुछ अलग था
फूलों की महक थी और चाँदनी का मद था
काँपते पत्तों को चूम कर चलती थी वो
बहकी हुई दालों पर हंस कर फिसलती थी वो

ल़ाहेरें मचल कर उसे छूने को झपटि  थी
बारिश की बूड़ें हंस हंस कर टपकती थीं
चाँद यू इठला के बादलों में चलता था
मदहोश नज़ारा मानो लड़खड़ा कर संभलता था

समंदर के आगोश में जैसे के आग थी
बदल की गरज में, प्रेमी की प्यास थी
किनारे ने जश्न में खुद को मिटा दिया
बदालाओं ने झूम कर चाँद को च्छूपा लिया

उनके आधारों पर बूँदीएन झिलमिलती थीं
चाँदनी उन्हे रोक कर कोई दास्तान सुनाती थी
हवा उनके आँचल को छेड़ छेड़ जाती थी
लहरें पाओं को छू कर, और चटपटती थी

भीगे कपड़ों में ने हमारे मून को भिगोयाई यूँ
दहेकते चहेरे को हमने हाथों में संजोया यूँ
जैसे के बहते हुए इस पल को थम लेंगे हम
प्रेम के ज्वार को आज बाँध लेंगे हम

हवा ने मन की किताब को पढ़ लिया
ज़ोर से हँसी फिर हम से यूँ कहा
या मुझ को या वक्त को या सॅमेडर की लहरों को

या उपासना, या प्रेम को, बस रोको मत..बहने दो., बस रोको मत..बहने दो.

पहचान

पहचान


कौन है तू कौन है वक़्त ने पूछा मुझे
आईने के सामने बरबस खड़ा यूँ कर दिया
खोज में निकल पड़ा उस शाकस की, ख़याल की
जिसे देख कर पहचान लूँ के ये हूँ में , में हूँ यही


पंथी हूँ उस रह का, जिसका अंत ना आगाज़ है
या पंछी हूँ आकाश का जो ढूनडता पेरवाज़ है
सागर की गहराई हूँ या उस पर च्छालकती लेहायर हूँ बस
पर्वत की उँचाई हूँ या टूटा हुआ पत्थर हूँ बस


ख्वाब हूँ यह हूँ हक़ीकत, नीर हूँ या प्यास हूँ
प्यार का अनमोल गीत या टूटा हुआ एक साज़ हूँ
गहरा अंधेरा रात का या सुबह की नर्म धूप हूँ
कन हूँ बस धूल का या ब्रह्म का स्वरूप हूँ


जिस्म हूँ या आत्माजीव या परमात्मा
सत्या या मिथ्या हूँ में के भूला हुआ किस्सा हूँ में
झोंका हवा का मस्त या ठहेरा हुआ पानी हूँ में
नादान और बेबस हूँ या, समर्थ और ज्ञानी हूँ में


कौन हैं तू कौन है वक़्त ने पूच्छा मुझे
आईने के सामने बरबस खड़ा यूँ कर दिया….



थकने लगा थे खोज में, डूबा हुआ था सोच में
आईने ने तब पलटकर दिल को ये आवाज़ दी
चारों दिशयों में भटकता ढोंधता तू आज जो
मान की आँखें खोलकर ही मिलेगा राज वो


ईन्दिर्योन का रथ है तू और सारथी भी खुद है तू
रत्न है अनमोल जिसका परखी भी खुद है तू
ओम का अलंकार तू, भावनाओं का संसार तू
जिसकी कोई सीमा नहीं, ऐसा चमत्कार तू.


पहचान तेरी शब्दों में कभी बाँध सकती नहीं
अंतहीन आकाश में सीमाएँ खिच सकती नहीं
रस भी तू, रूप तू, ज्ञान का सागर भी तू

जिस रंग से दुनिया सजी उस रंग की गगर है तू.