Sunday, November 3, 2013

एक रात की बात

उस रात हवा का आलम कुछ अलग था
फूलों की महक थी और चाँदनी का मद था
काँपते पत्तों को चूम कर चलती थी वो
बहकी हुई दालों पर हंस कर फिसलती थी वो

ल़ाहेरें मचल कर उसे छूने को झपटि  थी
बारिश की बूड़ें हंस हंस कर टपकती थीं
चाँद यू इठला के बादलों में चलता था
मदहोश नज़ारा मानो लड़खड़ा कर संभलता था

समंदर के आगोश में जैसे के आग थी
बदल की गरज में, प्रेमी की प्यास थी
किनारे ने जश्न में खुद को मिटा दिया
बदालाओं ने झूम कर चाँद को च्छूपा लिया

उनके आधारों पर बूँदीएन झिलमिलती थीं
चाँदनी उन्हे रोक कर कोई दास्तान सुनाती थी
हवा उनके आँचल को छेड़ छेड़ जाती थी
लहरें पाओं को छू कर, और चटपटती थी

भीगे कपड़ों में ने हमारे मून को भिगोयाई यूँ
दहेकते चहेरे को हमने हाथों में संजोया यूँ
जैसे के बहते हुए इस पल को थम लेंगे हम
प्रेम के ज्वार को आज बाँध लेंगे हम

हवा ने मन की किताब को पढ़ लिया
ज़ोर से हँसी फिर हम से यूँ कहा
या मुझ को या वक्त को या सॅमेडर की लहरों को

या उपासना, या प्रेम को, बस रोको मत..बहने दो., बस रोको मत..बहने दो.

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