Sunday, November 3, 2013

पहचान

पहचान


कौन है तू कौन है वक़्त ने पूछा मुझे
आईने के सामने बरबस खड़ा यूँ कर दिया
खोज में निकल पड़ा उस शाकस की, ख़याल की
जिसे देख कर पहचान लूँ के ये हूँ में , में हूँ यही


पंथी हूँ उस रह का, जिसका अंत ना आगाज़ है
या पंछी हूँ आकाश का जो ढूनडता पेरवाज़ है
सागर की गहराई हूँ या उस पर च्छालकती लेहायर हूँ बस
पर्वत की उँचाई हूँ या टूटा हुआ पत्थर हूँ बस


ख्वाब हूँ यह हूँ हक़ीकत, नीर हूँ या प्यास हूँ
प्यार का अनमोल गीत या टूटा हुआ एक साज़ हूँ
गहरा अंधेरा रात का या सुबह की नर्म धूप हूँ
कन हूँ बस धूल का या ब्रह्म का स्वरूप हूँ


जिस्म हूँ या आत्माजीव या परमात्मा
सत्या या मिथ्या हूँ में के भूला हुआ किस्सा हूँ में
झोंका हवा का मस्त या ठहेरा हुआ पानी हूँ में
नादान और बेबस हूँ या, समर्थ और ज्ञानी हूँ में


कौन हैं तू कौन है वक़्त ने पूच्छा मुझे
आईने के सामने बरबस खड़ा यूँ कर दिया….



थकने लगा थे खोज में, डूबा हुआ था सोच में
आईने ने तब पलटकर दिल को ये आवाज़ दी
चारों दिशयों में भटकता ढोंधता तू आज जो
मान की आँखें खोलकर ही मिलेगा राज वो


ईन्दिर्योन का रथ है तू और सारथी भी खुद है तू
रत्न है अनमोल जिसका परखी भी खुद है तू
ओम का अलंकार तू, भावनाओं का संसार तू
जिसकी कोई सीमा नहीं, ऐसा चमत्कार तू.


पहचान तेरी शब्दों में कभी बाँध सकती नहीं
अंतहीन आकाश में सीमाएँ खिच सकती नहीं
रस भी तू, रूप तू, ज्ञान का सागर भी तू

जिस रंग से दुनिया सजी उस रंग की गगर है तू.

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