Saturday, April 25, 2026

दिल


है बड़ा कम्बख़्त ये

बहकता बेवक्त ये

धड़कनों की ताल पर

थिरकता हर वक़्त ये


वासनाओं का नीड ये

बेताबियों की भीड़ ये

तीर ये छिटका हुआ

राहगीर भटका हुआ


चाहतों हैं बेपनाह 

डूँढता अगला गुनाह

ख्वाहिशों की देग है

भरा हुआ ये मेघ है


सृष्टि के जलते हवन 

में फूँकी हुई ये आग है

अनंत तक सुलगती रहें

सामिग्री इच्छायें हैं


चतुर भी है चट भी

रचता है प्रपंच भी

कम्बख़्त की क्या पूछिये

तुम्हारा हमारा दिल है ये

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