जैसे जैसे उम्र ढलती
सुख की परिभाषा बदलती
वेग सूर्य का ज्यूँ उतरता
रूप साँझ का और निखरता
जो सुख होड़ लगाने में था
वो अब साथ निभाने में है
शिखरों को जो पाने में था
औरों को ले जाने में है
काल चक्र का पहिया चलता
जग की महिमा धूमिल करता
मन में नया विमर्श उभरता
सुख दुख का भी राग बदलता
पहले दूर जाने में खुश थे
अब वापस आने में खुश है
पहले रास रचाने में ख़ुश थे
अब ठहर जाने में ख़ुश हैं
जीत के जग को बहुत सुख पाया
गौरव यश भी खूब कमाया
पर अब थोड़ा सा रूक कर
प्रियजन साथ बैठ पाने में सुख है
मूसी हुई सी जीन्स पुरानी
कॉलेज जाते जाते बेटा छोड़ गया था
उसे उठा कर, तह लगा कर
अलमारी में रख पाने में सुख है
चार पौधे बिटिया के कमरे में
जिन्हें लाड प्यार से लेकर आई
अब उनका बच्चजों जैसे
ध्यान रख पाने में सुख है
नई गाड़ियाँ नए घर
नए तजुर्बे सब देखे भोगे
पुराने दोस्तों के साथ मगर अब
यादें पसराने में सुख है
नए नुमाइश और नया रंगढंग
नई कहानी सुन ली सब पर
वेद पुराण की कथा कहानी
सुन ने सुनाने में अब सुख है
पहले सब को समझाते थे हम
अपना पहलू बतलाते थे हम
पर कहाँ केसी किसी का परिपेक्ष बदला
सो अब चुप रह जाने में सुख हैं
जैसे जैसे उम्र ढलती
सुख की परिभाषा बदलती
वेग सूर्य का ज्यूँ उतरता
रूप साँझ का और निखरता
अतुल
April 2026
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