Monday, May 16, 2022

मैं


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फूल हूँ मैं

व्रक्ष मैं

हूँ हवा और 

आग मैं


बादल भी मैं

बिजली भी मैं

हूँ घटा 

और साँझ मैं


बुलबुला 

छोटा कभी

और ताल गहरा 

हूँ कभी


नृत्य मैं

सुर भी मैं

साज मैं

संगीत मैं 


हूँ लहर 

एक पल को मैं

सागर फिर 

बन जाऊँगा


प्रकृति का 

हूँ अंश आज

कल प्रकृति 

बन जाऊँगा


आया नहीं 

मेहमान बनकर

के कल कहीं

चला जाऊंग़ा


रूप ही 

बदलूँगा बस

खुद को यहीं

कल पाऊँगा


ब्रह्म की

कंपन्न आज

कल ब्रह्म खुद 

बन जाऊँगा

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