कह देना ख़ताओं से
हमें अब भी सताती हैं
जो हम ने कीं, जो तुम से हुईं
वो अब भी याद आतीं हैं
कभी तारीखें भूल जाना
कभी घर देर से आना
कभी चुप देर तक रहना
कभी बेबाक़ बोल जाना
कह देना ख़ताओं से
हमें अब भी सताती हैं
जो तुम ने कीं, जो हम से हुईं
वो जब भी याद आतीं
इन ग़ुस्ताख़ नज़रों का
महफ़िल में भटक जाना
उन मधहोश लबों का
किसी को देख मुस्काना
कभी क़समें तोड़ देना
कभी वादे ना निभाना
कभी रूठे हुए रहना
कभी तुमको ना मानना
कह देना ख़ताओं से
हमें अब भी सताती हैं
जो तुम ने कीं, जो हम से हुईं
वो जब भी याद आतीं
कह देना अदाओं से
हमें अब भी सताती हैं
जो तुम से लिपटी रहती थीं
वो जब भी याद आतीं
नज़रों का यूँ ही कभी
मिलके झुक जाना
ज़ुल्फ़ों से खेलते खेलते
बेबस ही मुस्काना
राह चलते कभी
फूलों को देख रुक जाना
हर शाम मिलने पर
लपक कर गले लगाना
कह देना अदाओं से
हमें अब भी सताती हैं
जो तुम से लिपटी रहती थीं
वो जब भी याद आतीं
कभी मासूम सी बकबक
कभी ख़ामोशी में भी बातें
कभी खोई खोई सी नज़रें
कभी बेसब्र सी आहें
कह देना अदाओं से
हमें अब भी सताती हैं
जो तुम से लिपटी रहती थीं
वो जब भी याद आतीं
आख़िर खता यूँ हम से हुई
एक ज़ालिम की इबादत कर बैठे
ज़ख़्म देने की आदतों को
उनकी अदा समझ बैठे
Monday, May 16, 2022
खतायें
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