Monday, May 16, 2022

खतायें


कह देना ख़ताओं से 

हमें अब भी सताती हैं

जो हम ने कींजो तुम से हुईं

वो अब भी याद आतीं हैं


कभी तारीखें भूल जाना

कभी घर देर से आना 

कभी चुप देर तक रहना 

कभी बेबाक़ बोल जाना


कह देना ख़ताओं से 

हमें अब भी सताती हैं

जो तुम ने कींजो हम से हुईं

वो जब भी याद आतीं


इन ग़ुस्ताख़ नज़रों का 

महफ़िल में भटक जाना

उन मधहोश लबों का

किसी को देख मुस्काना


कभी क़समें तोड़ देना

कभी वादे ना निभाना

कभी रूठे हुए रहना

कभी तुमको ना मानना


कह देना ख़ताओं से 

हमें अब भी सताती हैं

जो तुम ने कींजो हम से हुईं

वो जब भी याद आतीं


कह देना अदाओं से 

हमें अब भी सताती हैं

जो तुम से लिपटी रहती थीं 

वो जब भी याद आतीं


नज़रों का यूँ ही कभी

मिलके झुक जाना

ज़ुल्फ़ों से खेलते खेलते

बेबस ही मुस्काना


राह चलते कभी

फूलों को देख रुक जाना

हर शाम मिलने पर 

लपक कर गले लगाना


कह देना अदाओं से 

हमें अब भी सताती हैं

जो तुम से लिपटी रहती थीं 

वो जब भी याद आतीं


कभी मासूम सी बकबक

कभी ख़ामोशी में भी बातें

कभी खोई खोई सी नज़रें

कभी बेसब्र सी आहें


कह देना अदाओं से 

हमें अब भी सताती हैं

जो तुम से लिपटी रहती थीं 

वो जब भी याद आतीं


आख़िर खता यूँ हम से हुई

एक ज़ालिम की इबादत कर बैठे

ज़ख़्म देने की आदतों को 

उनकी अदा समझ बैठे


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