दोस्ती हवाओं से की
फूलों से आशिक़ी
सोया चाँदनी के साथ
गुफ़्तगू फ़िज़ाओं से की
आजदीययों के चमन में
सींची मैंने ज़िंदगी
बेफ़िकर आसमानों ने
दिल को मेरे पनाह दी
इस मोड़ पर कुछ दोस्त मिले
उस मोड़ पर मुहब्बत मिली
यूँ वक्त के करवांन पर
ज़िंदगी बढ़ती गयी
ना ढूंढता मंजिल कोई
ना ज़रूरत किसी मक़ाम की
राहों में ही खिल रही
मेरी ज़िंदगी की हर ख़ुशी
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