क्यूँ स्याही से कागज रंगते हो, क्यूँ कथा कहानी लिखते हो
कौन निहरेगा उनको जो सीपी तट पर चुनते हो
पुकार लो चाहे जितना तुम, आखें जितनी भी नॅम कर लो
वीरान हाँ सब वो रहें अब, जिन राहूओँ को तुम तकते हो
यादों के गहरे जंगल में; रात भटक कर रोई थी
पड़ाव तुमहरि aanchal का पहलू से बाँध के सोई थी
आँखों मीं जो chchalak उठीन्न, होटो पर जो लहराइन थीन
माज़ी से समझोता कर के; उन यादों को तुम दफ़न करो;
धूप समय की तेज़ी में, ओस प्यार की फ़ना हुई
झुलसे सपनों के आँगन में, तन्हाई का सुख सहने दो
किससे हसरतें बयान करें, किसके जबरन मेहमान बनें
हंम को अब यूँ ही रहने दो, हम को अब यूँ ही सहने दो
क्यूँ स्याही से कागज रंगते हो, क्यूँ कथा कहानी लिखते हो
कौन निहरेगा उनको जो सीपी तट पर चुनते हो
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