जब यूँ ही अकेला होता हूँ
दिल करता ये क़ुसूर है
झोंका तेरी यादों का
लाता तो ज़रूर है
लहरों की नटखट चंचलता
तेरी हंसीयों में छनती थी
उगते सूरज की लाली भी
तेरे गालों पर सजती थी
तेरी आँखों की मदिरा
मेरे दिल पल छलकी है
ख़ुशबू तेरे काँधे की
मेरे तन से लिपटी है
पी कर यादों की प्याली को
छाया यूँ सरूर है
कहने को ये बात तुझे
अब होता दिल मजबूर है
तेरे हाथों में हाथ रहे
दो चार क़दम हम साथ चलें
कुछ लम्हे तेरे साथ कटें
बस दिल का ये फ़ितूर है
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