तराशती है उम्र चेहरा
तजुर्बे की नौक से
देखो लकीरें सुना रही हैं
मेरी ज़िंदगी का फ़साना
उलझनों ने हैं खरोंची
पगडंडीयां माथे पे ऐसे
बहते चश्मे काटते हों
चट्टानों में राहें जैसे
गालों की सलवट हैं इशारा ab
हंसने का शौक़ था खूब मुझको
है वो एक अनमोल ख़ज़ाना
दोस्तों ने दिया जो मुझको
आखों के बाजू की लकीरें
सूखे आंसुओं छोड़ गए हैं
दो चार छींटें झुर्रीयों की
कशमकश से भी कमायी मैंने
खूबसूरत दिखने को तुम
जिन लकीरों को छुपा रहे हो
दौलत सारी जिंदगी की
में उन्हीं में नापता हूँ
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