Monday, May 16, 2022

सैलाब

 


है सैलाब बन के आई तू

मुझे डूबने से डर नहीं

तेरी आंधी में खो जाऊँगा 

इसकी फ़िकर नहीं 


तू जश्न है फ़ितूर है

तू है दीवानगी

भूकम्प है ऐसा 

के काँपे है सर ज़मीन


कौंधती हैं दिल में बिजलियाँ

है लहू में रवानगी 

धड़कनों की ताल पर 

अब जो नाचे है ज़िंदगी


डर है के थम ना जाए 

बस ये तूफ़ान ना कहीं 


डर है के थम ना जाए 

बस ये तूफ़ान ना कहीं

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