हमारी सुनो, हम तुम्हारे बाप हैं
पिताजी ने कभी ये हैकड़ी नहीं जमाई
याद नहीं कभी उन्होंने डाँटा हो
और हाथ उठाने की तो कभी नौबत ही नहीं आयी
बस काम में लगे रहते थे
और प्यार से मिलते थे
घर की व्यवस्था ठीक चलती रहे
इसी की चिंता करते थे
पिता होने का सब से बदा गुण
उन में कूट कूट के भरा था
बच्चों में आत्म सम्मान बढ़े
बस यही उनका फ़ॉर्म्युला था
ना कभी ज़्यादा टीका टिप्पणी की
ना कभी मीन मेख निकाली
सच पूछो तो माँ ही ने पाला
पिताजी, ने सिर्फ़ दी छाया
उस छाया का क़ीमत लेकिन
अब समझ आती है
अपने बच्चों में आत्म सम्मान
की उसी लड़ाई पर जब नज़र जाती है
चाहे स्कूल हो या खेल का मैदान
बच्चे जूझते हैं, लड़ते हैं
दो कदम आगे और एक कदम पीछे
चल कर सम्हलते हैं, हमारी ही तरह
ना पिताजी ने हमारा होमवोरक किया, ना गेंद फेंकनी सिखाई
वो सब हमने लड़ते झगड़ते सीख लिया
पिताजी ने तो सिर्फ़ कमर पर रखा था हाथ
और कहा लड़ो, बस
इस लिए जब कभी
बच्चों की उलझनों में
खुद उलझ जाता हूँ
कमर पर एक हाथ रखा पाता हूँ
वो हाथ अभी भी
हिम्मत दिलाता है
वो हाथ अभी भी
रास्ता दिखलाता है
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