अतीत सुनहरी साँकल एक
पहचानी सी जो लगती है
जाने कितनों को अक्सर जो
कारावास में रखती है
याद करो जब फिसले थे
चौखन्नी खा कर गिरे थे जब
अक्सर याद दिलाती है
दस्तक यही लगाती है
जो हो न सका, जो कर ना सके
ये झन झन राग बजती है
मत करो उपेक्षा स्वयं से अब
नित दिन ये समझाती है
जिस लायक़ हो, बस वही मिला
कुछ और नहीं अब बदलेगा
जो है उस से ही सब्र करो
बस मंत्र यही दोहराती है
अतीत सुनहरी साँकल एक
पहचानी सी जो लगती है
जाने कितनों को अक्सर जो
कारावास में रखती है
अतीत की साँकल तोड़ो अब
उँगली भविष्य की भी छोड़ो अब
वर्तमान में डुबकी लेकर
धारा समय की मोड़ो अब
क्या फ़र्क़ कहाँ से आयी हैं
क्यूकर कहाँ उन्हें जाना है
वर्तमान की लहरों को तो
बस अपना गीत ही गाना है
क्या हुआ कभी और क्या भ्रम था
क्या होगा आगे जाने कौन भला
सुखी वही है जो मानस
आज में रहकर श्रम करता
एक बुलबुला वर्तमान का
ये सारा दृश्य दिखलाता है
क्यूँ क़ैद हो साँकल के पीछे
जहां अंधकार की माया है
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