Monday, May 16, 2022

साँकल


अतीत सुनहरी साँकल एक

पहचानी सी जो लगती है

जाने कितनों को अक्सर जो

कारावास में रखती है


याद करो जब फिसले थे

चौखन्नी खा कर गिरे थे जब

अक्सर याद दिलाती है 

दस्तक यही लगाती है


जो हो  सकाजो कर ना सके

ये झन झन राग बजती है

मत करो उपेक्षा स्वयं से अब

नित दिन ये समझाती है


जिस लायक़ होबस वही मिला

कुछ और नहीं अब बदलेगा

जो है उस से ही सब्र करो

बस मंत्र यही दोहराती है


अतीत सुनहरी साँकल एक

पहचानी सी जो लगती है

जाने कितनों को अक्सर जो

कारावास में रखती है


अतीत की साँकल तोड़ो अब

उँगली भविष्य की भी छोड़ो अब

वर्तमान में डुबकी लेकर

धारा समय की मोड़ो अब


क्या फ़र्क़ कहाँ से आयी हैं

क्यूकर कहाँ उन्हें जाना है

वर्तमान की लहरों को तो

बस अपना गीत ही गाना है


क्या हुआ कभी और क्या भ्रम था

क्या होगा आगे जाने कौन भला

सुखी वही है जो मानस

आज में रहकर श्रम करता


एक बुलबुला वर्तमान का

ये सारा दृश्य दिखलाता है

क्यूँ क़ैद हो साँकल के पीछे

जहां अंधकार की माया है


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