तेरा खयाल
रात भर
आोस की बूंदेां की तरह
मन को भिगोता रहा
सपनों में भी
शायद
मैं तेरे
सपने संजोता रहा
सोचा था
दिन की कशमकश में उतर जायेगा जहन से
ओस की मासूम बूंद
हो जायेगी फना
मन की माटी पर
गीली है अब भी
खुश्बू तेरी सोंधी सी
उभरती है अब भी
तेरी आंखों की तरल झील में
जो सपने उतारे थे
उन्हें पाने की मीठी कसक
मचलती है अब भी
शाम की वादी भी ना
छुपा पायेगी तुझ को
रात आयेगी फिर से
तू याद आयेगी मुझ को
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