Monday, May 16, 2022

खयाल

तेरा खयाल 

रात भर

आोस की बूंदेां की तरह

मन को भिगोता रहा


सपनों में भी 

शायद

मैं तेरे 

सपने संजोता रहा


सोचा था 

दिन की कशमकश में उतर जायेगा जहन से

ओस की मासूम बूंद

हो जायेगी फना


मन की माटी पर

गीली है अब भी

खुश्बू तेरी सोंधी सी

उभरती है अब भी


तेरी आंखों की तरल झील में

जो सपने उतारे थे

उन्हें पाने की मीठी कसक

मचलती है अब भी


शाम की वादी भी ना 

छुपा पायेगी तुझ को

रात आयेगी फिर से

तू याद आयेगी मुझ को

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