Monday, May 16, 2022

नया दौर



लकीरों से बाहर रंग भरते हैं 

एक नया दौर शुरू करते हैं


जवानी ने फेरा लगाया था मगर

थोड़ी बेचैन थी थोड़ी बेख़बर

अधूरी कहानियाँ जो छोड़ कर गयी है

उनको अब फ़ुरसत से पूरा करते हैं



एक नया दौर शुरू करते हैं

लकीरों के बाहर रंग भरते हैं



मुट्ठी के रेट से को फिसल गए सपने 

उनको बटोर कर फलक पर रचते हैं

सूरज की लाली कोमदिरा की प्याली को 

रागों में उड़ेल करमंज़िल पर बढ़ते हैं


आधा दिन उतर गया आधा पर बाक़ी है

फ़िज़ाओं की महक पर उतनी ही ताजी है

पागल हवाओं में आसमान की बाहों में

चोखा  चटख रंग बहारों का भरते हैं


एक नया दौर शुरू करते हैं

लकीरों के बाहर रंग भरते हैं


No comments:

Post a Comment