लकीरों से बाहर रंग भरते हैं
एक नया दौर शुरू करते हैं
जवानी ने फेरा लगाया था मगर
थोड़ी बेचैन थी थोड़ी बेख़बर
अधूरी कहानियाँ जो छोड़ कर गयी है
उनको अब फ़ुरसत से पूरा करते हैं
एक नया दौर शुरू करते हैं
लकीरों के बाहर रंग भरते हैं
मुट्ठी के रेट से को फिसल गए सपने
उनको बटोर कर फलक पर रचते हैं
सूरज की लाली को, मदिरा की प्याली को
रागों में उड़ेल कर, मंज़िल पर बढ़ते हैं
आधा दिन उतर गया आधा पर बाक़ी है
फ़िज़ाओं की महक पर उतनी ही ताजी है
पागल हवाओं में आसमान की बाहों में
चोखा चटख रंग बहारों का भरते हैं
एक नया दौर शुरू करते हैं
लकीरों के बाहर रंग भरते हैं
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