Monday, May 16, 2022

ज़िंदगी




ये जो ज़िंदगी है ये तो 

आज़माएगी तुझे

झूट सच का फ़र्क़

ये सिखलाएगी तुझे


स्याह अंधेरी रात मैं 

डुबोएगी पहले 

फिर रोशनी सुबह की ये 

दिखाएगी तुझे 


ले कर चला  ख़्वाब जो 

नज़रों में तू भर के

आंसुओं के संग 

ये बहाएगी उन्हें


जहां तक तेरा ये हौसला 

छलांग भर सके

उस ही मक़ाम तक ही ये बस 

पहुँचाएगी तुझे


ओढ़ेगा जब खुमारी

बुढ़ापे की तू एक दिन

नयी नस्ल की हँसी से ये

बहलायेगी तुझे


छोड कर अना 

तू ग़र शागिर्द बन इसका 

रोज़ एक नया सबक़ नया

सिखाएगी तुझे 


कर सका ना कोई

इसके मंसूबों को बेपरदा

एक बार में बस एक दिन ही ये

दिखाएगी तुझे


ये जो ज़िंदगी है

ये तो आज़माएगी तुझे


इसकी हसीन अदाओं पर

कैसे ना कोई मरें

मौत से भी ये ही तो 

मिलवाएगी तुझे

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