ये जो ज़िंदगी है ये तो
आज़माएगी तुझे
झूट सच का फ़र्क़
ये सिखलाएगी तुझे
स्याह अंधेरी रात मैं
डुबोएगी पहले
फिर रोशनी सुबह की ये
दिखाएगी तुझे
ले कर चला थ ख़्वाब जो
नज़रों में तू भर के
आंसुओं के संग
ये बहाएगी उन्हें
जहां तक तेरा ये हौसला
छलांग भर सके
उस ही मक़ाम तक ही ये बस
पहुँचाएगी तुझे
ओढ़ेगा जब खुमारी
बुढ़ापे की तू एक दिन
नयी नस्ल की हँसी से ये
बहलायेगी तुझे
छोड कर अना
तू ग़र शागिर्द बन इसका
रोज़ एक नया सबक़ नया
सिखाएगी तुझे
कर सका ना कोई
इसके मंसूबों को बेपरदा
एक बार में बस एक दिन ही ये
दिखाएगी तुझे
ये जो ज़िंदगी है
ये तो आज़माएगी तुझे
इसकी हसीन अदाओं पर
कैसे ना कोई मरें
मौत से भी ये ही तो
मिलवाएगी तुझे
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