कहाँ दिल्ली बम्बई फँस गए यार
किस दलदल में हम धँस गए यार
एक नयी दिशा पकड़ते हैं
चल यार बनारस चलते हैं
जिस करम भूमि में लड़ते हम
वो हारती प्राण लता का दम
ये विकट राग़नी तज़ते हैं
चल यार बनारस चलते हैं
माया की महिमा उतरी अब
चालित जग का सूखा रस
नयी श्वास अब भरते हैं
चल यार बनारस चलते हैं
तोड़ें अब ये काराग़ार
अंतर ध्वनि से हो संचार
कथा निराली रचते हैं
चल यार बनारस चलते हैं
नहीं बानर शहर कोई
ना है किसी मंज़िल का नाम
ऐसी सुंदर पगडंडी वो
जहां खुद से खुद हम मिलते हैं
चल यार बानर चलते हैं
चल यार बनारस चलते हैं
No comments:
Post a Comment