Friday, October 20, 2023

भँवर

 भँवर

अतुल सिंह 

एक भँवर है अंतर्मन

और एक भँवर संसार 

किस में डूबें किस में उबरें 

कैसे जायें पार


अंतरमन की प्यास अलग है

ना माँगे घर व्यापार

गाड़ी बांग्ला नौकर चाकर 

ना उसको आंवें रास


भक्ति ञान की गंगा कलकल

करती जहां प्रवाह

ऐसे की सत्संग में तो

अंतरमन ढूँढे छाँव


ध्यानतर्क की सीढी चढ़कर 

झांके ये उस पार

ज्ञान और सत्य जहां विराजें

वहीं करे ये वास


ना स्वाद सुगंध का बोध है इसको 

ना सर्दी गर्मी से लाचार

ना प्रेम पाश में ये सुख पावे

रूपवती कितने हों नर और नार


संसार की बहती गंगा का पर

अपना अलग बहाव

रूप रंग और सोने की  कीयहाँ 

छलकें लहर हज़ार


सुख के पीछे दुख के आगे 

भागे ये दिन रात

वासनाओं के पंजे में ये

ख़ुद का करे विनाश


भव सागर में हिचकोले खाती

जीवन की ये नाँव

अटल सत्य के दुर्गम तट तक इसको

पहुँचाए ना संसार


अंतरमन ही राह दिखाये

अन्तर्मन ही दे साथ

अंतर्मन ही हाथ थामकर

ले जाये उस पार


एक भँवर है अंतर्मन

और एक भँवर संसार 

किस में डूबें किस में उबरें 

कैसे जायें पार

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