भँवर
अतुल सिंह
एक भँवर है अंतर्मन
और एक भँवर संसार
किस में डूबें किस में उबरें
कैसे जायें पार
अंतरमन की प्यास अलग है
ना माँगे घर व्यापार
गाड़ी बांग्ला नौकर चाकर
ना उसको आंवें रास
भक्ति ञान की गंगा कलकल
करती जहां प्रवाह
ऐसे की सत्संग में तो
अंतरमन ढूँढे छाँव
ध्यान, तर्क की सीढी चढ़कर
झांके ये उस पार
ज्ञान और सत्य जहां विराजें
वहीं करे ये वास
ना स्वाद सुगंध का बोध है इसको
ना सर्दी गर्मी से लाचार
ना प्रेम पाश में ये सुख पावे
रूपवती कितने हों नर और नार
संसार की बहती गंगा का पर
अपना अलग बहाव
रूप रंग और सोने की कीयहाँ
छलकें लहर हज़ार
सुख के पीछे दुख के आगे
भागे ये दिन रात
वासनाओं के पंजे में ये
ख़ुद का करे विनाश
भव सागर में हिचकोले खाती
जीवन की ये नाँव
अटल सत्य के दुर्गम तट तक इसको
पहुँचाए ना संसार
अंतरमन ही राह दिखाये
अन्तर्मन ही दे साथ
अंतर्मन ही हाथ थामकर
ले जाये उस पार
एक भँवर है अंतर्मन
और एक भँवर संसार
किस में डूबें किस में उबरें
कैसे जायें पार
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