ना जीत का कभी घमंड कर
ना मना हार का शोक
दोनों गुरूओं की कृपा बनी रहे
बस यही लगा तू भोग
जीत ये कह कर चली गई
तुझमें प्रतिभा की कमी नहीं
हार ये कह कर जाती है
अभी थोड़ी महनत बाकी है
जीत हार कोई अलग नहीं
एक सिक्के के दो चहरे हैं
कोशिश की माला जपता चल
दो मोती जिस्में रहते हैं
जीत की सीढ़ी चिकनी है
की ऊंची नाक तो फिसला तू
हार की ठोकर गहरी है
थोड़ा माथे से बहेगा लहू
मित्र बना कर दोनों को
गर उन्का तू सम्मान करे
ना होगी ताकत क्षींड़ कभी
चाहे दुश्मन कितना बलवा रहे
यत्न वो सागर मन्थन है
जो उग्ले अमृत विश दोनों
नीलकंठ बनकर ही लेकिन
कोई जीत का अमृत चखता है
याद रहे पर याद रहे
प्रयत्न तुझे करना होगा
कोशिश की हांडी चढ़ा चढ़ा
हर संकोच भस्म करना होगा
आखिर में देह चुक जाती है
बस चित्त साथ रह जायेगा
जो लकीर यत्न से खींच रहा
वही संस्कार बन जायेगा
ना जीत का कभी घमंड कर
ना मना हार का शोक
दोनों गुरूओं की कृपा बनी रहे
बस यही लगा तू भोग
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