Saturday, December 17, 2022

दौड़


जीवन के वेग को

थोड़ा तो लगाम दे

चख तो ले वो चार पल 

जो लिखे हैं तेरे नाम पे


ये भी करूं वो भी करूं

यहां जाऊं वहां भी जाऊं मैं

बुनता है मन ये जाल यूं

इस जाल को पहचान ले


ध्यान उन पर ले के 

जिन पलों में तू जी रहा

तेरे हिस्से आये जो

हैं जो तेरे सामने


इन्दिरियॉ समेट कर

अन्तरमन पे ध्यान कर

भागते इस रथ को तू 

थोड़ा तो विर्ष्राम दे


उलझनों के कारवां 

चलेंगे हमेशा यहां

उतर के उनकी पीठ से 

चिन्ताओं को विराम दे


स्वाद नजारों का ले

दोस्तों यारों का ले

जिस कल में तू जी रहा

वहां ये मिलें या ना मिलें


कदमों की ताल सुन जरा

धड़कनों का हाल सुन जरा

जो लहू बदन में बह रहा

उस की चाल सुन जरा


जिस धरती पे तेरे पांव हैं

जिस आकाश की तुझ पे छांव है

जो हवायें तुझे सींचती

जिस जल से है काया बनी


बोध कर उनका जरा

मस्तक वहां अपना झुका

वो जो रहते तेरे साथ हैं

फूंकें तुझ में प्राण हैं


सूरज का और चाँद का

सितारों भरी सांझ का

फिर नजारा कर जरा

उन्हें सांसों में तू भर जरा


जीवन के इस वन में तू 

खुद को खो के देख ले

इन पेड़ पौधौं के जैसा 

हो के जरा देख ले


आज में जो जी रहे

घूंट अभी का पी रहे

झूमते हवाओं में

महकती फिजाओं में


जिस की गोद में है खेलता

तू अंश है उस प्रकृति का

रुक कर उसे प्रणाम कर

खुद की तू पहचान कर


जीवन के वेग को

थोड़ी तो लगाम दे

चख तो ले वो चार पल 

जो लिखे हैं तेरे नाम पे



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